13 अक्टूबर 2020 - 11:46
कोरोना के इलाज के बाद अब गाय के गोबर से बनी चिप से रेडिएशन कम करने का दावा, लेकिन वैज्ञानिक क्या कहते हैं?

भारत में राष्ट्रीय कामधेनु आयोग ने गाय के गोबर से एक ऐसी चिप बनाने का दावा किया है, जिससे मोबाइल फ़ोन का रेडिएशन कम हो जाता है।

सोमवार को आयोग के अध्यक्ष वल्लभ भाई कथीरिया ने एक प्रेस कॉन्फ़्रेंस में यह दावा किया कि गाय के गोबर से बनी इस चिप को अगर मोबाइल के साथ रखा जाता है, तो इससे रेडिएशन काफ़ी हद तक कम हो जाता है।

उन्होंने कहा कि आने वाले समय में बीमारियों से बचने के लिए यह काफ़ी लाभदायक होगा। इसके साथ ही कामधेनु आयोग ने गाय के गोबर से बने कई दूसरे प्रॉडक्ट भी लॉन्च किए हैं।

ग़ौरतलब है कि यह कोई पहली बार नहीं है कि मोदी सरकार में किसी सरकारी संस्था ने गाय के पेशाब और गोबर के लाभ गिनाए गए हों। 2014 में नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में केन्द्र में बीजेपी की सरकार के गठन के बाद से ही हिंदुत्ववादी विचारधारा से संबंधित प्रतीकों को राष्ट्रीय प्रतीकों के रूप में बढ़ावा देने का अभियान जारी है।

मार्च में जब भारत में कोरोना वायरस महामारी ने अपने पैर पसारने शुरू किए तो मोदी सरकार के कई मंत्रियों और बीजेपी नेताओं ने गाय के पेशाब से कोविड-19 के उपचार का दावा किया।

केवल इतना ही नहीं, बल्कि हिंदुत्ववादी संगठनों ने जगह जगह ऐसी सभाओं का आयोजन किया, जिसमें सामूहिक रूप से गोमूत्र पीने की व्यवस्था की गई थी।

बहुत से हिंदूओं का मानना है कि गाय एक पवित्र जानवर है, तथा उसके पेशाब व गोबर में औषधीय गुण हैं।

हालांकि विशेषज्ञों ने बार-बार यह बात ज़ोर देकर कही है कि गोमूत्र से कोरोना या कैंसर जैसी बीमारियों का इलाज नहीं किया जा सकता है।

दक्षिणपंथी हिंदू राष्ट्रवादी पार्टी बीजेपी और आरएसएस के नेता गोमूत्र को दवा के रूप में इस्तेमाल करने और इससे कैंसर जैसी बीमारी के इलाज की वकालत करते रहे हैं।

इसी साल 500 से अधिक वैज्ञानिकों ने मोदी सरकार से आहवान किया था कि वह देसी गायों की "विशिष्टता" और गोमूत्र और गोबर से कैंसर उपचार समेत अन्य उपचारात्मक गुणों पर शोध के प्रस्ताव को वापस ले।

एक ऑनलाइन पत्र जारी करके, वैज्ञानिकों और शोधकर्ताओं ने सरकार के इस प्रस्ताव को "अवैज्ञानिक" क़रार देते हुए कहा था कि ऐसे समय में कि जब भारत में अनुसंधान केन्द्र वित्तीय संकट का सामना कर रहे हैं, यह सार्वजनिक धन का ग़लत इस्तेमाल है।

पत्र का मसौदा तैयार करने में मदद करने वाले होमी भाभा सेंटर फ़ॉर साइंस एजुकेशन के एक शोधकर्ता अनिकेत सुले का कहना है कि इस प्रस्ताव का मक़सद वैज्ञानिक शोध करना नहीं, बल्कि मौजूदा धार्मिक मान्यताओं की वैज्ञानिक पुष्टि करना है। सुले कहते हैं कि उन्हें पैसा फेंकने से पहले यह साबित करना चाहिए कि इस शोध को आगे बढ़ाने में कुछ योग्यता है।

वास्तव में सरकार ने फ़रवरी में यह प्रस्ताव दिया था, जिसके लिए काफ़ी बड़ा बजट विशेष किया गया है। इसमें कॉवपैथी समेत पांच विषयों पर शोध का आहवान किया गया है। इसी तरह से गाय उत्पादों को एंटीकैंसर और मधुमेह की दवाओं में इस्तेमाल करना शामिल है।

वैज्ञानिकों ने अपने पत्र में इस बिंदू का भी उल्लेख किया था कि सरकार के प्रस्ताव में सिर्फ़ एक प्रजाति की गाय का चयन करना पहली ही नज़र में उसे अवैज्ञानिक ठहराने के लिए काफ़ी है। वैज्ञानिकों का कहना था कि इस तरह की काल्पनिक योजनाओं में धन ख़र्च करना, जनता के पैसे को बर्बाद करना है।